Monday, 10 July 2017

यौनशोषण (​भाग 1 ​)


‘’मै ४ साल की थी| एक शाम घर में सिर्फ चाची और मैं थी|| उनके दूर के रिश्ते के भाई आये हुये थे| और मैं उनके गोद में बैठी खेल रही थी| मेरी चाची किसी काम से कमरे के बाहर गयीं और मेरे उस दूर के मामा ने बड़े अजीब ढंग से मेरे जाँघों के बीच सहलाना शुरू किया| अचानक चाची आ गयीं और वो उठ कर चले गये| मेरी माँ की आने पर मैंने जब उनको ये बात कही तो उन्होंने मेरी चाची को बताया और उस मामाजी का घर में आना बंद हो गया| फिर मैं ९ साल की हुई | भीड़ भाड़ वाले स्टेशन पर एक आदमी बार बार मेरे सीने को दबाए जा रहा था और मै दर्द से बिलबिला रही थी| घर पहुँच कर माँ को बताने पर जब कोशिश की गयी उसे ढूंढने की तो वो नहीं मिला| मेरी उम्र १० साल| अपने मामाजी के शादी में गाँव में गयी थी| रात में जब आर्केस्ट्रा हो रहा था तो मैं भी वहाँ थी| थकान के वजह से नीचे पुवाल पर लेट गयी और आंख लग गयी| मेरे पाटों के बीच में किसी के उँगलियों के सरसराहट से मेरी नींद अचानक खुली और मैं चीख मारकर बैठ गयी| सबने पूछना शुरू किया कि क्या हुआ और मैं बोल ना पायी क्योंकि मैं नहीं जानती थी कि वो कौन था और शायद मैं थोड़ी बड़ी हो गयी थी और देख सुन कर ये समझने लगी थी कि इन सारी बातों को छुपाते हैं| मेरी उम्र १६ साल| मैं पूरी तरह से जानती हूँ कि किस स्पर्श का मतलब क्या है और हर वक्त सजग रहती हूँ| इतनी सजग की रिश्तेदारों की आने पर या उनके यहाँ जाने पर मैं सो नहीं पाती| मैं २१ वर्ष की | कॉलेज के प्रोफ़ेसर ने डाउट पूछने जाने पर मेरा हाथ कुछ इस तरह पकड़ा की वो स्पर्श मेरे ज़ेहन में आज भी है| मैं २४ साल की हूँ| एक बैंक में काम करती हूँ| ओहदा है, मान है|मगर मेरे बॉस ने प्रमोशन देने के नाम पर मेरे साथ एक रात बिताने की ख्वाईश रखी| मैंने वो नौकरी छोड़ दी जिसको पाने के लिये मैंने दिन रात एक किये थे| मैं २६ साल की | अब शादी शुदा और नए जीवन में सतरंगी सपने सजाये जीने की कोशिश में| जीवन के पहिये को आगे बढाती मगर अपने हीं देवर के भद्दे मज़ाक और छेड छाड़ को पारिवारिक एकता के लिये झेलती | कुछ दिनों बाद वो देवर किसी सहयोगी के साथ जबरदस्ती करने के आरोप में गिरफ्तार हुआ| फिर लगा काश! मैंने पहले आवाज़ उठायी होती तो आज शायद उस लड़की को बचा पाती| मैं ३५ वर्ष की| एक दिन रात को घर लौटते वक्त थोड़ी देर हो गयी और ऑटो में सफर करते वक्त २ मर्दों के भद्दे इशारों और बतमीजी की शिकार| घर आकर बहुत रोयी|पर फिर कुछ कह ना पायी| मैं, मैं एक बच्ची हूँ , एक लड़की और फिर एक औरत| ये मेरी छोटी सी कहानी है|’’
​स्वाति

Wednesday, 5 July 2017

'आदत की रोटी'





''ठीक से बेलो''!
''अरे परथन बार-बार क्यों लगा रही हो ''!
''कितने साल हो गए, बराबर रोटी बेलना नहीं आया''!
"कैसे बेलती हो ? बीच में पतला -किनारे मोटा''? गोल-गोल घुमाओ रोटी को"!
''बराबर डालो तवे पर, अरे देखो मुड़ गया न..अब फूलेगा नहीं। मिनट बाद ही कड़ा हो जायेगा ''!
''ठीक से सेंको!चिमटा साइड से दबाओ भई ! अरे ये रोटी बीच से फूट गई!''
''मैं तो आज भी रोटी बना दूँ तो २ ऊँगली से टूट जाए और ३ निवाले में रोटी ख़तम''!
सास बोले जा रही थी और सरला चुपचाप शायद बीसवीं रोटी बना रही थी|
शादी के 18 साल बाद भी सुबह शाम ४०-४५ रोटी बनाने के बावजूद उसके सास-ससुर के लिए ना तो रोटी कभी गोल बेली गई थी, न बराबर और न मुलायम होती थी| रोटी का सोंधा होना तो दूर की बात थी| पति भी यदा-कदा बोल ही देते थे जो माँ रोटी बनाती हैं वो बात तुम में नहीं! बेचारी रोज़ सोचती इतने अभ्यास वो किसी और बात में करती तो या तो ओलम्पिक मैडल ला चुकी होती या साहित्य अकादमी!
एक साथ ३ जने खाने बैठे थे| सब गरम रोटी ही खाते थे| जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी और उतनी ही तेज़ी से मन बाँध रही थी| कुछ भी तो नहीं बदला था | जब ससुराल में उसने पहली बार रोटी बनाई थी उस समय से आज तक! उस दिन भी माँ ने कुछ सीखा के नहीं भेजा था और आज भी वो कुछ सीख नहीं पाई थी| अब तो ये आदत हो गई थी| रसोई समेट ही रही थी कि बेटा खाने आ गया|
खाना परोस कर उसके साथ ही बैठ गई| २ निवाले बाद ही बेटे ने कहा - "माँ ! तुम्हारे जैसी रोटियों का स्वाद किसी के हाथ में नहीं! कितनी नरम रहती है| कॉलेज में सब दोस्त बोलते हैं| ४ घंटे बाद भी बिल्कुल कड़ी नहीं होती!और कितनी गोल-गोल!"
बेटा बोले जा रहा था और सरला यही सोच रही थी - ''वही रोटी कैसे बदल जाती है जब बेटा खाता है, पति खाता है और सास-ससुर खाते हैं , माँ-बाप खाते हैं तो! रोटी भला कैसे बदलेगी? रोटी नहीं, हाँ शायद आदतें बदल जाती हैं तो रोटियां अलग अलग हो जाती हैं| किसी को बोलते रहने की आदत! किसी को कमी निकालने की आदत! किसी को लाड़ की आदत तो किसी को सिर्फ "माँ" की आदत!"
वह जानती थी ५ साल बाद उसकी बहू आएगी तो भी शायद यही होगा! बहू रोटी बनाएगी और शायद वह मीन-मेख निकालेगी! बेटा भी अपनी माँ की तारीफ़ करेगा और पत्नी की रोटियां कमियों वाली लगेगी! फिर उसके कुछ सालों बाद वही रोटी बहू के बच्चों के लिए दुनिया की सबसे सोंधी रोटी बन जायेगी|
'यह शायद पीढ़ी दर पीढ़ी आगे चलती रहेगी जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आई है| कोई नहीं सोचेगा कि जो रोटी बना रहा है वह क्या महसूस करता होगा ! उसे तो महसूस करने का शायद अधिकार भी नहीं!'
मगर उसने सोचा इसे कहीं तो रोकना होगा| वो खुद के लिए नहीं रोक पाई मगर शायद अगले के लिए रोक दे| अपने बच्चे को 'रोटी' समझाएगी , किसी रिश्ते की आदत या रिवायत नहीं! शायद वो ही कुछ बदल दे ताकि आने वाले सालों में उसके घर में सिर्फ रोटी पके कोई आदत नहीं|
स्वाति